उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ||

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उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्

विध्यालय ने श्रीमद्भगवद्‌गीता के छठे अध्याय में वर्णित पाँचवे श्लोक को अपने कार्य हेतु और अपने विद्यार्थियों को प्रेरणा देने के उद्देश्य से मूल मंत्र मानते हुए अपनाया है, जो कि इस प्रकार है-

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ।।

अर्थात,
"मनुष्य को अपना उद्धार स्वयं करना चाहिए, उसे अपना स्तर नहीं गिराना चाहिए, क्योंकि मनुष्य स्वयं अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।"

ज्ञान मंदिर क्या है?

13 जून 1967 को 4 बालक और 2 बालिकाओं को एकत्रित कर एक गरीब की कुटिया में ज्ञानार्जन के कार्य का शुभारम्भ किया गया।
इसके नामकरण का प्रथम शब्द "ज्ञान" और इसके शुभारम्भ का स्थल, भोईवाड़ा की गरीब बस्ती का एक मंदिर (धर्मराज जी का देवरा) है, अतः इसके नामकरण का दूसरा शब्द "मंदिर", इस प्रकार यह "ज्ञान मंदिर" बना।

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